Ticker

6/recent/ticker-posts

मक्के की खेती कैसे करें? बुवाई से कटाई तक क्या-क्या करें

मक्का एक ऐसी फसल है जो देश के अलग-अलग हिस्सों में अलग-अलग मौसम और परिस्थितियों में उगाई जाती है। इसका इस्तेमाल इंसानों के भोजन के साथ-साथ पशुओं और मुर्गियों के चारे तथा कई तरह के उद्योगों में भी किया जाता है।

लेकिन, खेत में मक्का बोने के बाद सिर्फ़ पानी और खाद देना काफ़ी नहीं है। बीज की क्वालिटी और मिट्टी की शुरुआती हालत, पौधों की सही संख्या बनाए रखना, फसल को खरपतवार से बचाना और कीड़ों या पानी की दिक्कतों का समय पर पता लगाना—ये सभी छोटी-छोटी बातें पैदावार पर असर डालती हैं।

इसलिए, मक्के की खेती करते समय शुरू से ही यह तय करना ज़रूरी है कि खेत में कौन-सी किस्म बोनी है, बुआई का कौन-सा तरीका अपनाना है और फसल के विकास के किन चरणों पर ज्यादा ध्यान देने की जरूरत है।

यह लेख मक्के की खेती की पूरी प्रक्रिया को आसान शब्दों में समझाएगा—जमीन तैयार करने से लेकर बुआई, खाद डालने, सिंचाई, खरपतवार और कीटों की रोकथाम से लेकर फसल की कटाई तक।

मक्के के खेत में फसल का निरीक्षण करता किसान

मक्का लगाने से पहले खेत की स्थिति देख लें

ऐसी मिट्टी जिसमें पानी आसानी से निकल सके और पर्याप्त नमी भी बनी रहे, मक्का उगाने के लिए अच्छी मानी जाती है। खेत में लंबे समय तक पानी जमा रहना मक्के की फसल के लिए नुकसानदायक हो सकता है।

बुवाई से पहले खेत की स्थिति का आकलन करना ज़रूरी है, क्योंकि हर खेत की ज़रूरतें अलग-अलग होती हैं। कहीं मिट्टी में नमी कम हो सकती है, तो कहीं पानी की निकासी की समस्या हो सकती है।

अगर संभव हो, तो मिट्टी की जाँच के आधार पर खाद और उर्वरकों के इस्तेमाल की योजना बनाएँ। इससे अंदाज़े पर निर्भर रहने के बजाय मिट्टी में मौजूद पोषक तत्वों की स्थिति के आधार पर सही फैसला लेना आसान होता है।

बुवाई का समय मौसम देखकर तय करें

मक्के की बुवाई का समय पूरे भारत में एक जैसा नहीं होता। खरीफ मक्के में मानसून का समय खास मायने रखता है, जबकि रबी और जायद की फसल के लिए परिस्थितियाँ अलग होती हैं।

उदाहरण के लिए, ICAR की 2025 की खरीफ कृषि सलाह में खरीफ मक्के की बुवाई के लिए 15 जून से 15 जुलाई का समय बताया गया है, लेकिन बुवाई का समय मानसून के आगमन के अनुसार रखने की बात भी कही गई है। इसलिए इसे पूरे भारत के लिए एक तय तारीख नहीं माना जाना चाहिए।

अपने इलाके में बारिश कब शुरू होती है, खेत में नमी कैसी है और आगे मौसम कैसा रहने वाला है—इन बातों को देखकर बुवाई का समय तय करना ज्यादा सही रहेगा।

बीज चुनते समय सिर्फ पैदावार पर ध्यान न दें

मक्के की खेती में बीज का चुनाव एक बहुत जरूरी शुरुआती फैसला है, जिसका असर पूरी फसल पर पड़ सकता है। बाजार में अलग-अलग मौसम, इलाकों और उपयोग के हिसाब से कई तरह की किस्में और हाइब्रिड उपलब्ध हैं।

ICAR की मक्का संबंधी जानकारी में भी अलग-अलग परिस्थितियों के लिए विकसित हाइब्रिड और किस्मों का उल्लेख मिलता है। उदाहरण के लिए, ICAR की सूची में ‘पूसा विवेक QPM 9 इम्प्रूव्ड’ और ‘DMRH 1308’ जैसी किस्में शामिल हैं।

हालांकि, इसका मतलब यह नहीं है कि कोई एक ही किस्म हर किसान के लिए सबसे अच्छी होगी। बीज का चुनाव अपने इलाके, मौसम, सिंचाई की सुविधा और फसल को किस उद्देश्य से उगाया जा रहा है—इन बातों को ध्यान में रखकर करना चाहिए।

प्रमाणित और अच्छी गुणवत्ता वाला बीज खरीदना भी उतना ही जरूरी है।

बुवाई से पहले मक्के के बीज की जांच करता किसान

खेत तैयार करते समय एक बात का ध्यान रखें

बुवाई से पहले खेत की जुताई करके मिट्टी को ऐसी स्थिति में लाना चाहिए, जिससे बीज के अंकुरण के लिए सही माहौल और पर्याप्त नमी मिल सके। अगर पिछली फसल के अवशेष या खरपतवार बहुत ज्यादा हों, तो उन्हें पहले हटाना या उचित तरीके से प्रबंधित करना जरूरी है।

खेत को समतल रखना भी फायदेमंद होता है। इससे सिंचाई के दौरान पानी के असमान जमाव को कम करने में मदद मिलती है और खेत के किसी एक हिस्से में ज्यादा पानी जमा होने या दूसरे हिस्से में पानी की कमी रहने की समस्या कम हो सकती है।

अगर जैविक खाद या अच्छी तरह सड़ी हुई गोबर की खाद का इस्तेमाल करना हो, तो इसे खेत तैयार करते समय मिट्टी में मिलाया जा सकता है।

हालांकि, खाद की जरूरत और उसकी मात्रा हर खेत के लिए अलग हो सकती है। इसलिए, मिट्टी की जांच के नतीजों के आधार पर खाद और उर्वरक की योजना बनाना बेहतर रहता है।

बुवाई में पौधों की संख्या बिगड़ने न दें

मक्के की बुवाई करते समय सिर्फ बीज बोना ही काफी नहीं है। खेत में पौधों की संख्या और उनके बीच की दूरी भी फसल के विकास पर असर डालती है।

अगर पौधे बहुत ज्यादा हों, तो उन्हें पर्याप्त धूप, पानी और पोषक तत्व नहीं मिल पाते। वहीं, अगर पौधे बहुत कम हों, तो उपलब्ध जमीन का पूरा इस्तेमाल नहीं हो पाता।

इसलिए, बुवाई के समय बीज की गहराई और पौधों के बीच की दूरी चुनी गई किस्म, मिट्टी की स्थिति और स्थानीय सिफारिश के अनुसार रखें।

मशीन से बुवाई करने पर कतारों और बीजों के बीच की दूरी को एक समान रखने में मदद मिल सकती है।

कतारों में मक्के की बुवाई करता किसान

शुरुआती दिनों में खरपतवार को नजरअंदाज न करें

जब मक्के की फसल छोटी होती है, तो खेत में उगने वाले खरपतवार पानी, पोषक तत्वों और जगह के लिए फसल से मुकाबला करते हैं। इसलिए, शुरुआती दौर में खेत की निगरानी करना जरूरी है।

अगर खरपतवार बहुत बड़े हो जाते हैं, तो उन्हें नियंत्रित करना अक्सर मुश्किल हो जाता है।

हाथ से निराई-गुड़ाई, मशीनी निराई या जरूरत के अनुसार खरपतवारनाशी का इस्तेमाल किया जा सकता है। कौन-सा तरीका अपनाना है, यह खेत में मौजूद खरपतवार के प्रकार, फसल की अवस्था और स्थानीय कृषि सलाह पर निर्भर करता है।

ICAR की 2025 की खरीफ कृषि सलाह में मक्के में बुवाई के लगभग 20–25 दिन बाद पहली निराई और लगभग 45 दिन बाद दूसरी निराई करने की सलाह दी गई है। इसी सलाह में कुछ परिस्थितियों में बुवाई के 2–3 दिन के भीतर प्री-इमर्जेंस खरपतवारनाशी के इस्तेमाल का भी उल्लेख है। ऐसे रसायनों का इस्तेमाल हमेशा संबंधित उत्पाद के लेबल और स्थानीय कृषि सलाह के अनुसार ही करें।

मक्के के छोटे पौधों के बीच उगे खरपतवार

खाद एक साथ डालने के बजाय फसल की जरूरत समझें

मक्के की अच्छी पैदावार के लिए संतुलित पोषण जरूरी है। सिर्फ यूरिया की मात्रा बढ़ाने से सभी खेतों में पैदावार उसी अनुपात में बढ़े, ऐसा जरूरी नहीं है।

नाइट्रोजन के अलावा जरूरत के हिसाब से फास्फोरस, पोटैशियम और दूसरे पोषक तत्वों की भी आवश्यकता हो सकती है। इसलिए, मिट्टी की जांच के आधार पर खाद और उर्वरक डालने की योजना बनाना बेहतर तरीका है।

ICAR की 2025 की खरीफ कृषि सलाह में खेती की स्थिति के अनुसार नाइट्रोजन की पूरी मात्रा एक बार में देने के बजाय उसे अलग-अलग चरणों में देने की सलाह दी गई है। इसलिए, खाद और उर्वरक का प्रबंधन फसल की जरूरत और स्थानीय कृषि सिफारिश के अनुसार करना चाहिए।

हालांकि, किसी एक इलाके के लिए दी गई खाद और उर्वरक की सिफारिश को सीधे दूसरे राज्य या जिले में लागू नहीं करना चाहिए।

पानी की कमी ही नहीं, जलभराव भी समस्या है

मक्के की फसल में सिंचाई का फैसला सिर्फ दिनों की गिनती के आधार पर नहीं करना चाहिए। बारिश, मिट्टी में नमी और फसल की बढ़वार के चरण को ध्यान में रखकर पानी की जरूरत तय करना बेहतर रहता है।

फसल की तेजी से बढ़वार और उसके बाद दाना भरने के चरण में पानी की कमी का असर पैदावार पर पड़ सकता है। दूसरी तरफ, खेत में लंबे समय तक पानी जमा रहने से भी पौधों को नुकसान हो सकता है।

इसलिए, फसल की जरूरत के अनुसार मिट्टी में पर्याप्त नमी बनाए रखें और जहाँ पानी जमा होने का खतरा हो, वहाँ जल निकासी की उचित व्यवस्था करें।

ICAR ने मक्का आधारित खेती प्रणालियों में सिंचाई प्रबंधन पर भी काम किया है। इसके कुछ अध्ययनों में परिस्थितियों के अनुसार पानी के बेहतर उपयोग की संभावनाएँ बताई गई हैं।

मक्के के खेत में मिट्टी की नमी जांचता किसान

पत्तियों को देखकर फसल की हालत समझें

मक्के के खेत में सिर्फ ऊपर से फसल देखकर आगे बढ़ जाना ठीक नहीं है। समय-समय पर पौधों की पत्तियों, बीच के हिस्से और तने को भी ध्यान से देखें।

अगर पत्तियों पर असामान्य निशान दिखाई दें, पौधों की बढ़वार रुकती हुई लगे या पौधे के बीच के हिस्से में नुकसान नजर आए, तो उसके कारण का पता लगाने की कोशिश करें।

मक्के में Fall Armyworm (फॉल आर्मीवर्म) जैसे कीट भी नुकसान कर सकते हैं। ICAR ने इसके लक्षणों की पहचान और प्रबंधन को लेकर किसानों तथा कृषि अधिकारियों के लिए प्रशिक्षण और जागरूकता कार्यक्रम भी आयोजित किए हैं।

हर कीट के लक्षण एक जैसे नहीं होते। इसलिए केवल पत्तियों में छेद देखकर तुरंत कोई भी कीटनाशक डालने के बजाय पहले समस्या की सही पहचान करना बेहतर है।

फसल बढ़ने के साथ निगरानी भी बढ़ाएं

मक्का लगाने के बाद खेत को सिर्फ सिंचाई और खाद के समय देखने की जरूरत नहीं है। फसल की अलग-अलग अवस्थाओं में अलग-अलग समस्याएँ सामने आ सकती हैं।

शुरुआत में अंकुरण और पौधों की संख्या देखें। इसके बाद खरपतवार और पौधों की बढ़वार पर ध्यान दें। आगे चलकर पानी, पोषण और कीट-रोग की स्थिति पर भी नजर रखें।

इस तरह समस्या दिखाई देने के बाद कार्रवाई करने के बजाय कई बार उसे शुरुआती अवस्था में ही पहचानकर समय पर जरूरी कदम उठाए जा सकते हैं।

भुट्टा देखकर कटाई का फैसला न करें

मक्का की कटाई का समय इस बात पर निर्भर करता है कि फसल किस उद्देश्य से उगाई गई है और दाने कितने विकसित हुए हैं।

दाने के लिए उगाई गई फसल की कटाई तब की जाती है जब फसल पक जाए और दाने अच्छी तरह विकसित हो जाएँ। बहुत जल्दी कटाई करने से दानों में नमी ज्यादा रह सकती है।

इसके उलट, फसल को खेत में बहुत लंबे समय तक छोड़ने से मौसम, पक्षियों और अन्य कारणों से नुकसान का खतरा बढ़ सकता है।

इसलिए, सिर्फ कैलेंडर की तारीख पर निर्भर रहने के बजाय भुट्टों और दानों की वास्तविक स्थिति देखकर कटाई का फैसला करना बेहतर है।

पकी हुई मक्के की फसल की कटाई करता किसान

कटाई के बाद मक्के को सूखाना भी जरूरी है

अच्छी फसल लेने के बाद अगला काम उसे सुरक्षित रखना है। मक्के के दानों में नमी ज्यादा रह जाए तो भंडारण के दौरान फफूंद लगने और अनाज खराब होने की समस्या हो सकती है।

इसलिए भंडारण से पहले दानों को अच्छी तरह सुखाना चाहिए। जिस जगह मक्का रखा जा रहा हो, वह जगह भी साफ, सूखी और नमी से सुरक्षित होनी चाहिए।

ICAR के मक्के से जुड़े शोध और कृषि कार्यों में फसल कटाई के बाद के प्रबंधन और भंडारण की तकनीकों को भी महत्वपूर्ण विषयों में शामिल किया गया है।

भंडारण के दौरान समय-समय पर मक्के की जांच करते रहें। नमी, कीटों के हमले या फफूंद लगने के शुरुआती संकेत दिखाई दें तो उन्हें नजरअंदाज न करें।

कटाई के बाद मक्के के दाने सुखाता किसान

मक्के की खेती में होने वाली कुछ आम गलतियां

अक्सर, मक्के की खेती में बड़ी समस्याएँ किसी एक बड़ी गलती से नहीं, बल्कि छोटी-छोटी चूकों से शुरू होती हैं।

बिना सोचे बीज चुन लेना: जो किस्म किसी दूसरे इलाके में अच्छा प्रदर्शन करती है, ज़रूरी नहीं कि वह आपके खेत के लिए भी उपयुक्त हो।

शुरुआत में खरपतवार छोड़ देना: अगर पौधे छोटे ही रह जाएं और खरपतवार तेज़ी से बढ़ें, तो फ़सल को नुकसान हो सकता है।

खाद की मात्रा खुद से बढ़ा देना: जरूरत से ज्यादा खाद देना संतुलित पोषण का विकल्प नहीं है।

पानी जमा रहने देना: मक्के को नमी की ज़रूरत होती है, लेकिन लगातार जल-जमाव फसल के लिए अच्छा नहीं माना जाता है।

कीट दिखते ही दवा डाल देना: सबसे पहले कीट या बीमारी की सही पहचान करना ज़्यादा ज़रूरी है।

कटाई के बाद दानों की नमी को नजरअंदाज करना: भंडारण के दौरान यह गलती दानों में फफूंद लगने और उनके खराब होने का कारण बन सकती है।

क्या मक्के की खेती में मशीनों का इस्तेमाल फायदेमंद है?

अगर खेत का आकार बड़ा है, तो बुवाई, निराई-गुड़ाई और कटाई के लिए मशीनों का इस्तेमाल करने से समय की बचत हो सकती है और मजदूरी का खर्च कम हो सकता है।

सीड ड्रिल या प्लांटर का इस्तेमाल करने से बुवाई एक समान रखने में मदद मिल सकती है। कुछ परिस्थितियों में मैकेनिकल वीडर से खरपतवार नियंत्रण का काम भी आसान हो सकता है।

हालांकि, हर किसान के लिए मशीनरी खरीदना जरूरी नहीं है। फैसला खेत के आकार, मजदूरों की उपलब्धता, मशीनरी किराए पर लेने के खर्च और फसल से होने वाली संभावित आमदनी जैसी बातों को ध्यान में रखकर लेना चाहिए।

ICAR ने मक्का की खेती में मशीनीकरण, समय पर बुवाई और कटाई जैसे कामों के लिए कृषि उपकरणों के इस्तेमाल को बढ़ावा देने से जुड़ी जानकारी भी दी है।

मक्के की खेती को आसान तरीके से समझें

अगर पूरी खेती को एक साथ देखें, तो सबसे पहले अपने खेत और मौसम के हिसाब से सही बीज चुनना है। इसके बाद खेत को बुवाई के लिए तैयार करें और पौधों की संख्या सही रखने पर ध्यान दें।

फसल निकलने के बाद शुरुआती दिनों में खरपतवार को बढ़ने न दें। आगे फसल की जरूरत के अनुसार खाद और पानी का प्रबंधन करें। खेत में कीट या बीमारी के लक्षण दिखाई दें तो समय रहते उनकी पहचान करें और जरूरत के अनुसार उचित कदम उठाएँ।

अंत में, फसल पूरी तरह पकने पर कटाई करें और दानों को अच्छी तरह सुखाकर सुरक्षित जगह पर रखें।

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

मक्के की बुवाई कब करनी चाहिए?

यह मौसम और क्षेत्र पर निर्भर करता है। खरीफ में मानसून के आगमन के अनुसार बुवाई का समय तय करना बेहतर रहता है। रबी और जायद में बुवाई का समय अलग हो सकता है।

मक्के के लिए कैसी जमीन अच्छी होती है?

ऐसी जमीन बेहतर रहती है जिसमें पर्याप्त नमी बनी रहे और अतिरिक्त पानी आसानी से निकल सके। लंबे समय तक जलभराव वाली जमीन में समस्या हो सकती है।

क्या मक्के में सिर्फ यूरिया डालना काफी है?

नहीं। फसल को संतुलित पोषण की जरूरत होती है। खाद की मात्रा मिट्टी की जांच और स्थानीय सिफारिश के आधार पर तय करना बेहतर है।

मक्के में खरपतवार कब नियंत्रित करें?

शुरुआती दौर में खरपतवार पर खास ध्यान देना चाहिए। निराई-गुड़ाई या खरपतवारनाशी का चुनाव खेत की स्थिति और स्थानीय कृषि सलाह के अनुसार करें।

मक्के में फॉल आर्मीवर्म कैसे पहचानें?

पत्तियों और पौधे के बीच वाले हिस्से में दिखाई देने वाला नुकसान इसके संकेत हो सकते हैं। लक्षणों की सही पहचान करने के बाद ही नियंत्रण का तरीका चुनना चाहिए।

मक्के में कितनी सिंचाई करनी चाहिए?

इसकी कोई एक संख्या सभी खेतों के लिए सही नहीं है। मिट्टी, बारिश, मौसम और फसल की अवस्था के अनुसार सिंचाई की जरूरत बदलती है।

मक्के को भंडारण से पहले सुखाना क्यों जरूरी है?

दानों में ज्यादा नमी रहने पर भंडारण के दौरान फफूंद और खराब होने का खतरा बढ़ सकता है। इसलिए भंडारण से पहले दानों को उचित स्तर तक सुखाना जरूरी है।

निष्कर्ष

मक्के की सफल फसल सिर्फ अच्छी गुणवत्ता वाले बीज पर निर्भर नहीं करती। खेत की स्थिति, बुवाई का समय, पौधों की संख्या, शुरुआती दौर में खरपतवार नियंत्रण, संतुलित पोषण और पानी का सही प्रबंधन—इन सभी बातों का ध्यान रखना जरूरी है। साथ ही, पूरी फसल की नियमित निगरानी भी करनी चाहिए।

सबसे जरूरी बात यह है कि मक्के की खेती का तरीका हर जगह एक जैसा नहीं होता। इसलिए खेती की योजना बनाते समय अपने इलाके की मिट्टी, मौसम और पानी की स्थिति के साथ-साथ चुनी गई किस्म को भी ध्यान में रखना बेहतर रहता है।